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किसानों को क्यों डरा रहा है नया कृषि क़ानून?

इन बिलों में प्रस्तावित किए गए सुधार इतने खतरनाक हैं कि किसानों को सडकों पर इकठ्ठा होकर प्रदर्शन करना पड़ा जो अब तक जारी है. सैद्धांतिक रूप से तो बिलों में प्रस्तावित किए गए सुधार काफी अच्छे नज़र आते हैं. लेकिन इनका इम्प्लीमेंटेशन बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है.

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अज़हरअंसार | इंडिया टुमारो

नई दिल्ली | जून 2020 में मोदी सरकार ने कृषि-सम्बन्धी तीन बिल पेश किए थे और सितम्बर 2020 में लोकसभा और फिर राज्यसभा में इन बिलों को पास करा लिया गया. रविवार 20 सितम्बर को राज्यसभा में इनका विरोध कुछ इस तरह हुआ कि दस राज्यसभा सदस्यों को निलंबित कर दिया गया. इसके बाद सभी सांसद गांधी प्रतिमा के पास धरने पर बैठ गए. कृषि बिल को ध्वनी मत से पास करा लिए गया.

इन बिलों के पास होने के बाद अचानक से अपोजिशन पार्टियों में जान आ गई और सभी इन बिलों के विरोध में और किसानों के पक्ष में खड़े हो गए. इसमें कुछ पार्टियों का रुख तो एकदम हैरान करने वाला था. शिरोमणि अकाली दल क़ी सांसद व केंद्र सरकार में मंत्री रहीं हरसिमरत कौर ने इन बिलों का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया और उनक़ी पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन पर “पुनर्विचार” क़ी धमक़ी दे दी.

एक सप्ताह बाद यानी 26 सितम्बर की शाम को अकाली दल ने NDA गठबंधन से अलग होने की अधिकारिक घोषणा भी कर दी. अगले ही दिन 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने भी तीनों बिलों पर सहमति के साथ मंजूरी दे दी. कांग्रेस नेता और सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने इन विधेयकों को किसानों का डेथ वारंट बताया था.

फ़िलहाल देशभर में सरकार द्वारा लाए गए इन कृषि सुधार बिलों का विरोध हो रहा है. कुछ लोगों को लगता है विरोध मुख्यतः पंजाब और हरियाणा में चल रहा है, लेकिन 25 तारिख को किसानों द्वारा किए गए भारत बंद में हमने देखा कि उत्तर प्रदेश, तमिलनाड, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा यहाँ तक कि बिहार में भी इसका विरोध हुआ है जहाँ 2006 में ही इस तरह के कथित सुधार हो चुके हैं. 25 तारिख को और भी कई राज्यों में इस बिल को लेकर प्रदर्शन हुए.

मोदी जी ने बिहार में एक ब्रिज के उद्घाटन समारोह में इन सुधार बिलों को एतिहासिक बताया है. अच्छा हुआ कि उन्होंने इसके समर्थन को राष्ट्रवाद और विरोध को देशद्रोह नहीं कहा!

अब समझते हैं कि ये तीन बिल कौन से हैं? इनमें क्या है? और एग्रीकल्चर या किसानों को ये बिल किस तरह से प्रभावित करेंगे?

सबसे पहले जिन तीन बिलों की बात हो रही है वो हैं:-

पहला किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020 [The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020]

दूसरा मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता अध्यादेश, 2020 [The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Bill, 2020]

तीसरा आवश्यक वस्तुएं (संशोधन) अध्यादेश, 2020 [The Essential Commodities (Amendment) Bill, 2020]

इन बिलों में प्रस्तावित किए गए सुधार इतने खतरनाक हैं कि किसानों को सड़कों पर इकठ्ठा होकर प्रदर्शन करना पड़ा जो अब तक जारी है. सैद्धांतिक रूप से तो बिलों में प्रस्तावित किए गए सुधार काफी अच्छे नज़र आते हैं. लेकिन इनका इम्प्लीमेंटेशन बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है.

किसानों को या कृषि व्यापारियों को मुख्य रूप से इन बिलों की तीन बातों पर दिक्कत है:-

पहली ये सुधार किसानों को अपना उत्पाद APMC मंडियों या APMC एक्ट में नोटिफाई किए गए बाज़ारों की सीमाओं के बाहर देशभर में कहीं भी बेचने की बात करता है. APMC का मतलब होता है Agricultural Produce Marketing Committee. मतलब APMC की मंडी जहाँ फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार खरीदती है उसे साइड किया जा रहा है.

दुसरी किसानों को डर है कि इन सुधारों को लागु किया गया तो ये न्यूनतम समर्थन मूल्य-MSP या मिनिमम सपोर्ट प्राइस की व्यवस्था को पूरी तरह से ख़त्म कर देंगे.

तीसरी बिल में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की प्रणाली को बनाने की बात की गई है. मतलब एक किसान और खरीदार के बीच एक अग्रीमेंट के ज़रिए फसल को तैयार होने से पहले ही बेचा जा सकता है. इसमें डर यह है कि बिग बाज़ार और रिलाइंस जैसे बड़े प्लेयर सीधे एग्रीकल्चर में प्रवेश करेंगे और इसे काफी प्रभावित करेंगे.

अब आपको लग रहा होगा कि ये तो काफी जटिल मामला है, और सच में ये है भी.

सोचिये कि एक आदर्श समाज में क्या होता है, किसान अपने अनाज, सब्जी या जो भी फसल उगाता है, उसे बाज़ार में लाता है और वहां पर उससे खरीदार यानी आप और हम अपनी ज़रूरत की चीज़ किसान से दाम तय करने के बाद घर ले आते है. लेकिन हम आदर्श समाज में नहीं रहते और खेत से अनाज आम लोगों तक पहुँचने की जो प्रक्रिया है वो थोड़ी जटिल है.

होता क्या है? इस तरह समझिए – एक सर्वे के मुताबिक भारत में 86 प्रतिशत किसान या खेती की ज़मीन रखने वाले लोग मझौले या छोटे किसान हैं. इसका मतलब ये है कि एक साधारण किसान के लिए प्रॉफिट बनाने लायक फसल कर पाने की संभावनाएं काफी कम हैं. इसके बाद भी मौसम की मार, फर्टिलाईज़र्स, कीटनाशकों की कीमतें, पानी, बिजली, कृषि उपकरण इन तमाम चीज़ों की समस्या है, वो अलग.

फिर भी एक साधारण किसान जितना उत्पादन कर सकता है करता है और उसे बाज़ार लेकर जाता है. बाज़ार मतलब राज्य सरकार की APMC वाली मंडी में. जहाँ सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि वो उसके उत्पाद की इतनी कीमत तय करे कि किसान को एक वाजिब दाम मिल सके. जो अनाज, सब्जी, दाल या जो भी उत्पाद होता है, APMC मंडी में उसे या तो एक लाइसेंस धारी व्यापारी या जिसे मिडिल मैन कह सकते है, खरीदता है. यहाँ किसान खरीदारों में जो उसे सही दाम देता है उसे अपना उत्पाद बेचता है, व्यापारी किसान से नेगोशिएट करता है.

मतलब हम जिसे प्राइस डिस्कवरी कहते हैं वो यहाँ APMC मंडी में होती है. फिर अगर किसान से उसकी फसल कोई नहीं खरीदता है तो यहाँ सरकार उससे ये फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP – मिनिमम सपोर्ट प्राइस) पे खरीदती है. MSP यानि किस चीज़ का क्या दाम होगा ये सरकार तय करके रखती है और उस दाम पर किसान सरकार को अपनी फसल बेच सकता है. MSP पर बेचने पर ज़रूरी नहीं कि किसान को फायदा ही हो लेकिन ये इस बात को तय कर देता है कि किसान जब मंडी आए तो वो अपने घर वापस खाली हाथ न लौटे और कुछ न कुछ उसकों आगे खेती करते रहने के लिए मिल जाए.

मतलब एक तरह से MSP किसान के लिए एक सेफ्टी नेट वाला काम करता है. फायदा नहीं हुआ लेकिन नुकसान भी न हो. हालाँकि गहराई में जाएंगे तो MSP की भी कई कहानियां हैं.

अब इस पूरे मंडी वाले एपिसोड के बाद व्यापारी यानि किसान से फसल लेने वाला मिडिल मैन इसे बाज़ार में या फ़ूड प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों को देता है और सरकार भण्डारण करती है. फिर इस तरह से किसान का उगाया हुआ अन्न हमारे पास पहुँचता है.

अब तक कुछ राज्यों में किसी भी रिटेलर, होलसेलर या फ़ूड कंपनी को अगर कानूनी तरीके से किसानों का उत्पाद खरीदना है तो उसे APMC वाली मंडी में जाकर लाइसेंस धारी व्यापारी से ही खरीदना होता था. जो सरकारों के अधीन होती है. अब ये होगा कि प्राइवेट प्लेयर्स सीधे किसानों से उनका उत्पाद खरीद सकते हैं. और जो प्रदर्शन चल रहे हैं उनका सबसे बड़ा कारण यही है.

किसानों को डर है कि जब सरकार उनके ऊपर से हाथ हटा लेगी तो बड़े कोर्पोरेट उनका शोषण करना शुरू कर देंगे. वे सीधे अधिक मात्रा में खरीद करेंगे और छोटे-मझौले किसान मजबूर होंगें कि उन्हें कम कीमत पर बेचें यहाँ तक MSP से भी कम दर पे. और ये डर वाजिब भी है.

दि हिन्दू की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 2006 में मंडियों को ख़तम किए जाने के बाद जो हुआ, वो बताता है कि किसानों को अपनी ज़्यादातर फसलें MSP की दर से भी कम में बेचनी पड़ी है.

दूसरा, जो किसानों का डर है वो यही है कि ये एक समानांतर बाज़ार बनाने की सरकार की नीति MSP की व्यवस्था को पूरी तरह से ख़त्म कर देगी. हालाँकि मोदी जी ने कहा है कि MSP भी बाकी रहेगा. लेकिन किसानों को सरकार की मंशा पे शक है. बहुत साफ़ है कि APMC मंडी के सामने ही जब दूसरी बिना टैक्स वाली प्राइवेट मंडी को मंजूरी दे दी जाएगी तो किसान की मज़बूरी बन जाएगी वहां जाना.

दूसरी तरफ APMC मंडियों को साइड लाइन करना एक तरह से देशभर में अलग अलग फसलों के दामों में अस्थिरता पैदा कर देगा. मतलब ये कि प्राइस डिस्कवरी वाला प्रोसेस जैसा कुछ भी अब बाकी नहीं रहेगा.

अब एक तरफ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग वाली बात है तो आप सोच सकते हैं कि कोई भी प्राइवेट कंपनी छोटे मझोले किसान के पास फसल खरीदने नहीं जाने वाली और अगर गई तो अपनी मर्जी की कीमत पर खरीद कर उसका शोषण ही करेगी. कुल मिलाकर कहें तो एग्रीकल्चर सेक्टर भी एक पूंजीवादी बाज़ार में बदलने वाला है!

इन तमाम खतरनाक बातों के साथ एक बात और है जो डराती है, वो ये कि ये सरकार जब अपने एतिहासिक सुधारों को इम्प्लीमेंट करती है तो क्या होता है? आपको याद होगा, एतिहासिक नोटबंदी, एतिहासिक आधार, एतिहासिक GST.

फिर ये भी बड़ा ही खतरनाक है कि सरकार ने इन बिलों को बनाते वक्त इस क्षेत्र से जुड़े तमाम हितधारकों (stakeholders) से कोई कंसल्टेंसी, कोई बातचीत नहीं की है. विपक्ष ने मांग की थी कि बिलों को पार्लियामेंट्री सेलेक्ट कमेटी के पास अध्ययन के लिए भेजा जाए लेकिन ये किस तरह से पास करा लिए गए वो आपने देखा होगा.

अब ये बिल एक्ट बन चुके हैं. इनमें दर्ज किसान विरोधी कानूनों के अलावा भी इन्हें केंद्र सरकार ने जिस तरह से मनमानी कर एक्ट बनाया है, कई सवाल खड़े करता है. उन सभी सवालों पर भरपूर चर्चा ज़रूरी है.

कृषि बिल:

1.       The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020

https://www.prsindia.org/billtrack/farmers-produce-trade-and-commerce-promotion-and-facilitation-bill-2020

2.       The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Bill, 2020

https://www.prsindia.org/billtrack/farmers-empowerment-and-protection-agreement-price-assurance-and-farm-services-bill-2020

3.       The Essential Commodities (Amendment) Bill, 2020

https://www.prsindia.org/billtrack/essential-commodities-amendment-bill-2020

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