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मंगलवार, जून 25, 2024
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ताकि हर शब्द दिल में बैठ जाए

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  • एस. अमीनुल हसन

आधुनिक समय का इन्सान अपनी इन्सानी हैसियत को खोता जा रहा है, इसका कारण यह है कि यह संपूर्ण जगत जिसके आदेश से चल रहा है उस ईश्वर के अस्तित्व को आधुनिक समय के इन्सान ने मानने से इन्कार कर दिया, जिसके नतीजे में ख़ुद उसने अपने व्यक्तित्व को खो दिया। वह अपने केंद्र व धुरी से निकलकर बाहर आ चुका है, अब जानवरों की सतह पर जा गिरने से उसे कोई चीज़ बचा नहीं सकती। अब मानव सभ्यताएं भी पतन का शिकार हो रही हैं।
आधुनिक समय के राज्यों और सरकारों को देखिए, नफ़रतों का बाज़ार गर्म है। अत्याचार, अन्याय और अराजकता का राज है। ऐसे हालात में सीधी राह और ईमान से जुड़े हुए लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे लोगों के बीच पहुचें और उन्हें ईश्वर का मार्ग दिखाएं।
इसलिए कि आज के समय का इन्सान अपने भीतर ख़ाली-ख़ाली महसूस करता है। वह अपने जीवन में दिशाहीन है। उसके जीवन को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वह किसी जंगल, वीराने या रेगिस्तान में इधर-उधर भाग रहा हो और उसे अपनी मंज़िल का पता नहीं है। इन्सान की इस हालत पर क़ुरआन कहता है–
‘‘ऐ नबी, इनसे पूछो कि क्या हम अल्लाह को छोड़कर उनको पुकारें जो हमें फ़ायदा दे सकते हैं न नुक़सान? और जबकि अल्लाह हमें सीधा मार्ग दिखा चुका है तो क्या अब हम उल्टे पांव फिर जाएं? क्या हम अपनी हालत उस व्यक्ति की-सी बना लें जिसे शैतानों ने बयाबान (सहरा) में भटका दिया हो और वह हैरान व परेशान फिर रहा हो, हालांकि उसके साथी उसे पुकार रहे हों कि इधर आ, यह सीधी राह मौजूद है? कहो, ‘‘वास्तव में सही मार्गदर्शन तो सिर्फ़ ईश्वर (अल्लाह) ही का मार्गदर्शन है और उसकी ओर से हमें यह आदेश मिला है कि विश्व के मालिक के आगे आज्ञाकारिता के साथ सिर झुका दो।’’ (क़ुरआन, 6:71)
आज हालत यह है कि हमारी पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होकर रह गई है । ऐसे में हमारा सबसे महत्वपूर्ण काम यह है कि समाज को फिर से उसकी असल बुनियादों की ओर लौटाएं । प्रेम, स्नेह और ज़िम्मेदारियों को समझना एवं उन्हें स्वीकार किए जाने के साथ ही राज्यों और सरकारों का सुधार इस प्रकार से हो कि वे न्याय व समानता पर क़ायम हो जाएं। इन कामों को करने के लिए बहुत से माध्यम हैं, उनमें भाषण एक महत्वपूर्ण माध्यम एवं उपकरण है। आज भी, जबकि तकनीक बहुत ही विकसित हो चुकी है । संचार के नित नए उपकरण हमारे सामने आ चुके हैं, इसके बावजूद भाषण का जादू आज भी चलता है ।
आज भी भाषण के कौशल से झूठ को सच और सच को झूठ साबित कर दिया जाता है। इस कौशल के माध्यम से नफ़रत की गोलियों को बेचकर अपनी राजनीति को चमकाया जाता है। लोग इन गोलियों को बड़े चाव से लेते हैं और खाते हैं, जिसके नतीजे में पूरे समाज में एक अराजकता फैल रही है। यदि हम हिटलर का उदाहरण देखें तो पता चलता है कि उसके भाषण सोए हुए लोगों को जगा देते थे। अपने ज़बरस्त भाषणों से वह इन्सानों को दरिंदों की सहत उतार देता था।
इसी प्रकार समाज में भलाई लानी हो तो भी भाषण एक महत्वपूर्ण माध्यम व उपकरण है। जो लोग समाज में बिगाड़ लाए उन्होंने भी भाषण के कौशल का इस्तेमाल किया। मार्टिन लूथर किंग, जूलियर के वे भाषण जोकि बेहद प्रभावशाली और ऐतिहासिक हैं, देखने और सुनने से पता चलता है किस प्रकार से उसने इसकी एक कल्पना प्रस्तुत की कि मैं एक ऐसी दुनिया को देखना चाहता हूं जहां समानता हो, प्रेम एवं स्नेह हो। हम एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहां गोरे और काले का भेद न हो।
अब्राहम लिंकन के शानदार भाषणों के नतीजे में अमेरिका के अश्वेत लोगों की स्थिति में सुधार आया। ऐसे बहुत से शानदार भाषण आज भी आपको सुनने और देखने को मिल जाएंगे, जिनमें ज़बरदस्त जादू मौजूद है। एक-एक शब्द दिलों के भीतर जाकर बैठ जाते हैं। विचारों एवं मन मस्तिष्क के सांचों को बदल देने वाले भाषण होते हैं। इसलिए अल्लाह ने आपको भी बोलने, अपने विचारों को लोगों के सामने रखने की जो की योग्यता प्रदान की है उसे और निखारने की ज़रूरत है।
क़ुरआन कहता है–‘‘उसी ने इन्सान को पैदा किया और उसे बोलना सिखाया।’’ (क़ुरआन, 55:3-4)
यह बात सही है कि दो-चार लोगों के बीच बात कर लेना तो आसान होता है, लेकिन जहां पचास साठ लोग मौजूद हों, मजमे के सामने खड़े होकर लोगों के बीच बोलने से बहुत से लोग घबराते हैं। हमें इस घबराहट को दूर करना चाहिए। भाषण एक कला है इस कला को हमें सीखना चाहिए। दुनिया में हर चीज़ सीखने से आती है। साईकिल, मोटर साईकिल या कार चलाना हमने सीखा, जीवन में और भी बहुत सी चीज़ों को हमने सीखा, इसी प्रकार भाषण कला को भी हमें सीखना चाहिए।
हममें से वे लोग जो अपने मुहल्ले, अपने शहर और अपनी बस्ती में खड़े होकर बात कर सकते हैं, उन्हें चाहिए कि अपने भाषण की योग्यता को बेहतर बनाएं। उसे मांजें और उसमें चार चांद लगाएं। उसकी बाक् कला, भाषण की शैली एवं संबोधन का कौशल ऐसा हो, जिसके नतीजे में लोगों के विचार बदल जाएं और उनके क़दम भलाई की ओर बढ़ने लगें। ऐसा भाषण न हो जो उबाऊ और लोगों को बोर करने वाला हो बल्कि भाषण ऐसा हो जो सोते हुए लोगों को जगा दे। बेहिस लोगों के अंदर हिस पैदा कर दे और मुर्दों के अंदर एक नई जान फूंक दे।
मुख्य रूप से भाषण के तीन मक़सद होते हैं। पहला मक़सद है सूचनाओं को साझा करना। सूचनाओं को साझा करने के लिए भाषण दिए जाते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि जब हम भाषण देने के लिए खड़े हों तो उससे सूचनाएं साझा हों और सुनने वाले को कोई नई बात मिले। यदि नया ज्ञान, नई बातें और नए विचार न हों तो भाषण बिल्कुल रस्मी हो जाएगा। भाषण का दूसरा मक़सद है लोगों को प्रेरित करना। किसी विशेष कार्य या उद्देश्य को लेकर लोगों में उत्साह का संचार करना और उन्हें जगाना। ऐसे भाषण प्रेरणा के लिए होते हैं। भाषण का तीसरा उद्देश्य मनोरंजन है। दुनिया में हर दौर में मनोरंजन के लिए भी भाषण होते रहे हैं, मनोरंजन इस समय हमारा विषय नहीं है, लेकिन उक्त दोनों विषय गंभीर और महत्वपूर्ण हैं।
यहां भाषण के लिए कुछ महत्वपूर्ण और बुनियादी बातों का उल्लेख करना ज़रूरी है। हालांकि चंद शब्दों पूरी बात का उल्लेख करना कठिन है, लेकिन फिर भी संक्षेप में मैं अपनी बात को रखने का प्रयास करूंगा। इसके लिए पहली बुनियादी बात है ‘तैयारी’। तैयारी का मतलब यह है कि यदि पांच मिनट की भी सार्वजनिक चर्चा करनी हो तो आपको तैयारी करना अनिवार्य है। बिना तैयारी के कभी भाषण नहीं देना चाहिए।
जब आप किसी विषय या मुद्दे पर बात करें तो यह देख लें और तय कर लें कि वह विषय क्या है। आप उस पर, क्यों? क्या? और कैसे? का पूरा संदर्भ देख लें। कोई भी विषय हो, आप सवाल खड़े करिए। यह क्या है? यह क्यों है? यह कैसे है? जब आप सवाल खड़े करेंगे तो आपकी तैयारी होगी। तैयारी का मतलब यह नहीं है कि आप लाइब्रेरी से किताबें निकालें और उसे खोलकर उसके पन्नों में चीज़ों को तलाश करें। मानसिक तैयारी स्वयं अपने आप में एक बहुत बड़ी तैयारी होती है और भाषण के लिए तो मानसिक तैयारी ही बेहद ज़रूरी है, जिससे आपके भाषण का एक ढांचा बन जाएगा। एक बार जब ढांचा बन जाए तो इसके बाद उसे भरने के लिए आप किताबों और पत्र पत्रिकाओं को देख सकते हैं।

विषय की शुरुआत कैसे होगी, उस विषय को आप आगे कैसे लेकर चलेंगे और उसका अंत कैसे होगा? जब आप भाषण देंगे तो अंत में आप सुनने वालों से क्या उम्मीद रखते हैं? उन पर आप क्या प्रभाव छोड़ना चाहते हैं और उनमें क्या परिवर्तन देखना चाहते हैं? आपके भाषण की कार्य योजना क्या है? इन बातों पर विचार करना ही मानसिक तैयारी है।
दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आपकी तैयारी हो जाए तो भाषण में आपकी उपस्थिति कैसी हो? जब आप भाषण दें तो कैसे दिखें, ऐसा न लगे कि जैसे सोते हुए उठ कर सीधे आ गए हों। ऐसा न हो कि आपके बाल बिखरे और कपड़े आड़े तिरछे हों। खड़े हों तो ऐसा न लगे कि आपकी टांगों में दर्द है और आप घबराए व सहमे हुए हैं। यदि आपके हाव-भाव, कपड़े या बाल इत्यादि आड़े तिरछे होंगे तो सुनने वालों की दिलचस्पी उसमें बढ़ जाएगी और जो कुछ बोल रहे होंगे उस पर उनका ध्यान नहीं जाएगा। इसलिए यह ज़रूरी है कि एक वक्ता को शानदार तरीक़े से आकर खड़ा होना चाहिए। हो सकता है कि उस वक़्त आपकी कही हुई बात ऐतिहासिक हो जाए और सौ साल बाद लोग उसे उठाकर देखें कि आपने कोई ऐसी बात कह दी जिसके नतीजे में दुनिया के इतिहास का धारा बदल गई। इसलिए भाषण के समय आपकी उपस्थिति कैसी हो यह बहुत महत्वपूर्ण है।

सबसे आख़िर में आता है प्रस्तुतीकरण। जब आप भाषण देना शुरू करें तो आपका आत्मविश्वास प्रकट होना चाहिए। महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी बात के प्रभाव में 7 प्रतिशत मौखिक, 38 प्रतिशत स्वर एवं शैली और 55 प्रतिशत शारीरिक भाषा की भूमिका होती है। इसलिए जिस प्रकार की बात चल रही हो उसी प्रकार के स्वर, शैली और शारीरिक भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। यह सब कुछ सीखने से आता है। बहुत से ऐसे संस्थान हैं जो इसका पूरा प्रशिक्षण देते हैं और सिखाते हैं। मैंने आपको सामने केवल एक इशारा दिया है। आप चाहें तो स्वयं इसकी रूप-रेखा तैयार कर सकते हैं और सीख सकते हैं ताकि आप जो संदेश लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं उसे प्रभावशाली ढंग से पहुंचा सकें। nn

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