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मंगलवार, जून 25, 2024
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कथ्य, तथ्य और सत्य

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  • प्रो. सैयद शाहिद अली

मौत एक ऐसी सच्चाई है, जिसको झुठलाया नहीं जा सकता। इन्सान अपने क़रीबी, अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को मौत के गाल में समाते हुए देखता है, लेकिन उन्हें मौत से बचा नहीं सकता। उसे यह ख़याल भी आता है कि एक दिन उसे भी मरना है और सदैव के लिए इस संसार से चले जाना है।
इन्सान के समाने कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनका सही उत्तर मिलना अत्यंत आवश्यक है। जैसे-जीवन क्या है? इस जगत का स्रष्टा कौन है? हम से वह क्या चाहता है? मौत क्या है, मौत के पश्चात जीवन है या नहीं, अगर जीवन है, तो परलोक में सफल व कामयाब होने के लिए इस सांसारिक जीवन में क्या करना होगा? अगर जीवन नहीं है? तो क्या मौत के पश्चात जीवन समाप्त हो जाता है?
इन प्रश्नों पर दार्शनिकों और विद्वानों ने हमेशा ही चिंतन-मनन किया है। विशेष रूप से इस जीवन के बाद आने वाली मौत के बारे में तथा कुछ धर्मों में भी इसके बारे में प्रकाश डाला गया है, जो इस तरह है–
1. जीवन अस्ल और आख़िरी है। मरने के बाद कोई जीवन नहीं है, इसलिए इन्सान जीवन को हर तरह से सफल बनाए। जीवन का उद्देश्य बस ऐशो-आराम और भोग-विलास है।
2. कुछ लोगों का विचार है कि मौत के बाद जीवन है। इसे परलोक का जीवन कह सकते हैं। स्वर्ग और नरक भी एक सच्चाई है। पारलौकिक जीवन में स्वर्ग पाने के लिए इन्सान उस ईश्वर के बेटे पर अपनी आस्था रखे और यह स्वीकार करे कि हर इन्सान पैदाइशी गुनाहगार है, अर्थात जन्मजात पापी है। उसके बेटे ने सूली पर जान देकर इन्सानों के गुनाहों और पापों का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) अदा कर दिया।
3. कुछ दूसरे लोगों का विचार है कि मरने के बाद जीवन का अंत नहीं होता। इन्सान अपने भले और बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए बार-बार इस संसार में जन्म लेता है। कभी कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और कभी इन्सान के रूप में। यहां तक कि 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात इन्सान को मुक्ति मिलती है।
4. एक धारणा यह है कि यह सांसारिक जीवन हर इन्सान के लिए एक इम्तिहान है। इन्सान और समस्त जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, चल-अचल सब चीज़ों का स्रष्टा एक है। ईश्वर ने इन्सान को बुद्धि-विवेक प्रदान की है, ताकि वह सोच-विचार करके अपना जीवन-व्यतीत करे कि मौत के बाद एक हमेशा का जीवन है। जिसने ईश्वर को एक मालिक, पालनहार, स्रष्टा मानकर उसके बताए हुए मार्ग पर चलकर अपना जीवन निर्वाह किया, वह मरने के बाद स्वर्ग का अधिकारी होगा, यह उसके लिए बहुत ही बड़ी सफलता है। जिसने ईश्वर को नहीं माना और उसके बताए गए मार्ग पर न चला और अप

ना जीवन ईश्वरीय इच्छा के विपरीत गुज़ारा, वह नरक का भागी होगा। उसे नरक की दहकती हुई आग में सदैव के लिए जलना होगा। यह उसके लिए बहुत नाकामी व असफलता होगी। इन्सान अपने सांसारिक कर्मों के लिए ईश्वर के समक्ष जवाबदेह है और हर कर्म के बारे में अल्लाह इन्सान से पूछेगा।इनमें से कौन-सा विचार सही और सच्चाई के क़रीब है? इसकी जानकारी प्राप्त करने

की ज़िम्मेदारी इन्सान की है। पारलौकिक जीवन या मृत्यु पश्चात जीवन के बारे में हमें बहुत सोच-समझ कर निर्णय करना है। आज के ग़लत फ़ैसले का परिणाम

कल नरक की आग और भयानक प्रकोप के रूप में सामने आये तो यह कितना भयानक परिणाम है। जो लोग मौत के बाद जीवन को आंखों से देखे बिना मानने के लिए तैयार नहीं हैं, वे विश्वास के साथ केवल इतनी बात कह सकते हैं कि हम नहीं जानते कि मरने के बाद कोई जीवन है या नहीं, लेकिन वे यह बात नहीं कह सकते कि हम जानते हैं कि मरने के बाद कोई जीवन नहीं है। इसी सच्चाई को मालूम करने के लिए आंखों से देखना ही एक मात्र रास्ता नहीं है।
आज तक कोई मरने वाला वापस लौटकर यह नहीं बताता कि

मौत के बाद जीवन है, स्वर्ग और नरक सब कुछ है और न ही उसने यह बताया कि मौत के बाद कोई और जीवन नहीं है। स्वर्ग और नरक की धारणा सब झूठ है,

मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है कि वहां कुछ नहीं है। जब जीवन के इतने अहम मसले में ऐसी सूरतेहाल से हम दो-चार हों तो फिर सच्चाई तक पहुंचने का मार्ग क्या हो सकता है?
मौत के बाद जीवन के बारे में आंखों देखी असफलता के बाद सच्चाई तक पहुंचने का दूसरा मार्ग यह है कि इन्सान अपनी पैदाइश और कायनात (ब्रह्मांड) की निशानियों और सबूतों पर सोच-विचार करके इसके सत्य व असत्य

होने के बारे में अपना मत प्रकट करे।
धार्मिक व पौराणिक किताबों, वेद और बाइबल से मालूम होता है कि मौत के बाद जीवन है। स्वर्ग और न

रक एक हक़ीक़त है। महाप्रलय के बाद मरे हुए इन्सान जीवित होकर स्वर्ग और नरक को अपनी आंखों से देखेंगे, यह बात बिल्कुल यथार्थ है। क़ुरआन आज से 1450 वर्ष पूर्व ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) पर अवतरित हुआ था। यह अन्ति

म ईश ग्रंथ है। इसमें समस्त मानव के लिए हिदायत, आदेश-निर्देश तथा मार्गदर्शन है। इसके बाद कोई और किताब मानव के मार्गदर्शन हेतु नहीं आएगी। हमारी आंखों से अदृश्य सच्चाई को जानने के लिए और स्वीकार करने के लिए पवित्र क़ुरआन इस ब्रह्मांड में फैली हुई क़ुदरत की

निशानियों और प्रमाणों पर चिंतन-मनन करने की दावत (आह्वान) देता है और उनकी आवश्यक्ताओं और मांगों के बारे में भी बताता है।
इन सच्चाइयों का इन्कार करने का जो नुक़सान होगा क़ुरआन उससे भी मानव को अवगत करता है। इसी लिए बुद्धि और विवेक तथा चिंतन-मनन करने की योग्यता ईश्वर ने केवल मनुष्य को दी है। इन्सान के लिए यह बहुत बड़ी परीक्षा की घड़ी है कि वह बुद्धि विवेक व योग्यता के द्वारा केवल अपनी अमानुषिक आवश्यकताओं को पूरा करता है, जैसे खाना-पीना, रहना-सहना इत्यादि। वह अपनी ज़िन्दगी के बुनियादी सवालात और अंजाम के बारे में चिंतन-मनन करके सही नतीजे तक पहुंचता है। किसी यथार्थ को अस्वीकार करने से सच्चाई नहीं बदलती।

एक ईश्वर निराकार सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी ईश्वर (अल्लाह) को मानने और उसके सामने पारलौकिक जीवन में कर्मों की जबावदेही का दृढ़ विश्वास के अमली तक़ाज़े हैं। इनको जानना और व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में पूरा करना ज़रूरी है।

विशेषकर ईश्वर ने अपना सन्देश और संपूर्ण जीवन के लिए मार्गदर्शन जिन ईशदूतों (नबियों और रसूलों) पर अवतरित किया उनको और अन्तिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को तथा उन पर अवतरित ईशग्रंथ क़ुरआन के अध्ययन से जीवन के इस मूल और अहम मसले की सच्चाई को समझने और स्वीकार करने तथा उसके बारे में निर्णय करने में सहायता मिलेगी।

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