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मंगलवार, जून 25, 2024
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ईश्वर से अगाध प्रेम का वसंत उत्सव

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  • शिब्ली अरसलान

रमज़ान वास्तव में ख़ुदा से मुहब्बत का एक मस्ताना मौसम है। उसकी मुहब्बत में, उसके हुक्म पर घंटों भूखे-प्यासे रहना, उच्च चारित्रिक गुणों के साथ छोटी बारीक कमज़ोरियों पर भी कड़ी निगाह रखते हुए पूरे उनतीस-तीस दिन गुज़ारना, आत्मिक शांती और आध्यात्मिक सौंदर्य बोध की तस्कीन का कैसा सुहाना मौसम है ये।
रमज़ान का रोज़ा कोई नई इबादत नहीं है। इन्सानों के लिए काफ़ी जानी पहचानी इबादत है ये। क़ुरआन कहता है ‘ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, तुम पर भी रोज़े अनिवार्य किए गये, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर अनिवार्य किए गये थे ताकि तुममें तक़वा (ईशपरायणता) पैदा हो। ‘‘यही वजह है कि हम रोज़े की अलग अलग शक्लें सारे ही धार्मिक समूहों में देखते हैं।’’
आख़िर रमज़ान के रोज़ों के अनिवार्य किये जाने का उद्देश्य क्या है?इन रोज़ों में रखा क्या है जो धार्मिकता का अनिवार्य हिस्सा ठहरा? ‘रुक जाना और छोड़ देना’ रोज़े की रुह है। जाएज़ ज़रुरतों और ख़ाहिशों से रुक जाने की ये वन मंथ ट्रैनिंग बाक़ी दिनों में हमें ज़रुरी और ग़ैर ज़रुरी कामों की समझ तथा नाजाएज़ ख़ाहिशों से रुकने व छोड़ने का हौसला देती है। यही समझ और हौसला धार्मिकता का वास्तविक अर्थ है।
आप कह सकते हैं कि किसी तरह चंद घंटे भूख-प्यास बर्दाश्त कर लेना कोइ बड़ी बात नहीं है, क्या महज़ इसके अभ्यास के लिए रमज़ान आता है? नहीं, भूखे-प्यासे रहते हुए हम उन निगेटिव जज़्बों को कितना लगाम दे पाते हैं, जो एक ज़िम्मेदार संवेदनशील इन्सान बनने की राह में रुकावट हैं, इस अभ्यास का नाम है रमज़ान। ये लक्ष्य है रोज़ों का। रोज़ों का मक़सद क़ुरआन के अनुसार ‘तक़वा अर्थात ईशपरायणता पैदा करना है‘। जिसके अंदर तक़वा की खूबी पैदा हो जाए, वो है मुत्तक़ी। इसलिए भूखे रहते हुए शऊर (चेतना) को बेदार रखना बहुत ज़रूरी है, बेहिस भूखे-प्यासे पड़े रहने और समय-गुज़ारी से कुछ हाथ नहीं आने वाला, तभी तो रसूलूल्लाह (सल्ल.) ने फ़रमाया ‘जिसने झूट बोलना और झूट पर अमल करना नहीं छोड़ा, अल्लाह को उसके भूखे-प्यासे रहने से कोइ मतलब नहीं’। जब हम भूखे-प्यासे होते हैं तो हमारी रचनात्मकता और संवेदनशीलता बढ़ जाती है, बस थोड़े ध्यान के साथ सतत् अभ्यास करने से हम आसानी से रमज़ान का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
रमज़ान का बहुत सीधा संदेश है-भौतिकता से थोड़ी दूरी। खाना-पीना और जाएज़ ज़रूरी चाहतों को एक तयशुदा वक़्त तक छोड़ने का मेसेज यही है कि जीवन में सब कुछ पाना और भरना नहीं होता, रुकना और त्याग ज़िन्दगी की बड़ी ख़ूबसूरती है। आज जबकि हम पूंजीवादी तरक़्की की गला-काट प्रतिस्पर्धा में ऐसी आपाधापी मचा रहे कि जीवन का दार्शनिक-आध्यात्मिक सौन्दर्य धूमिल हो गया है, ख़ाहिशों को सपने का नाम देकर,उसे हर क़ीमत पर हासिल करने की दौड़ इस युग की पहचान है, इसने ज़िन्दगी को अत्यंत कुरुप और बदनुमा बना दिया है, ऐसे में ‘रुक जाने और त्याग करने’ का भाव कितना सुन्दर और माधुर्य भाव है।
रमज़ान आज की सबसे बड़ी आफत ‘सर्वसमेटु नवपूंजीवादी ऊपभोक्तावाद’ से लड़ने का कारगर हथियार उपलब्ध कराता है। मगर इसका क्या किया जाए कि रमज़ान में सेहरी व इफ़्तार और फिर आख़िरी दिनों में ईद के नाम पर जिस तरह शहरों और विशेष तौर पर बड़े शहरों के मुसलमान बाज़ार के छलावे में फंस कर उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में लग जाते हैं, इससे रमज़ान और रोज़ों की रूह ही निकल जाती है। वास्तव में रमज़ान मुस्लिम समाज के लिए आज एक महोत्सव बन कर रह गया है।
अंत में, रमज़ान, क़ुरआन का महीना भी है,इसी महीने में क़ुआरान नाज़िल हुआ ताकि तक़वा प्राप्त करना सरल हो जाए। मगर ये ध्यान में रहे कि क़ुरआन पढ़ने का जो रूप समाज में प्रचलित है,वो लक्ष्य प्राप्ति के लिए किसी भी तरह उपयोगी नहीं है।
तिलवात करते समय ये ज़रूरी है कि क़ुरआन का एक एक शब्द अपने अर्थों द्वारा दिमाग को संबोधित करे, अनुवाद और व्याख्या की सहायता ली जाए। तब रमज़ान के माध्यम से हमारा व्यक्तित्व एक क्रांति से परिचित होगा।
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